ओशो को एम.ए. में दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर एस.एस.राय

 A.U.:Oxford of East:Hall of Fame-46

शंकर के अद्वैत-दर्शन के गहन अध्येता एवं शोधकर्ता के रूप में विख्यात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर एस.एस.राय (शिवशंकर राय) का जन्म 1917 में मिर्जापुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा आगरा में हुयी और वहीं सेंट जॉन कालेज से उन्होंने बी.ए. की उपाधि प्राप्त की तथा अंग्रेजी साहित्य में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये। उन्होंने आगरा कालेज से 1938 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे महान दार्शनिक प्रो.आर.डी.रानाडे के संपर्क में आये जिन्होंने उनकी मेधा से प्रभावित होकर उनको प्रेरणा दी कि वे दर्शनशास्त्र का अध्ययन करें। 


1942 में युवा श्री राय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी में एम.ए.की डिग्री प्राप्त की और सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। गुरुदेव प्रो.रानाडे अपने प्रिय छात्र शिवशंकर जी तथा कुछ और छात्रों को लेकर संगम जाया करते थे और वहाँ किनारे बैठकर दर्शनशास्त्र के गूढ़ तत्वों को समझाया करते थे। 


1946 में सागर में श्री हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय , की स्थापना हुई और श्री राय दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता के रूप में वहाँ नियुक्त हुये। लगभग एक दशक तक वे वहाँ अध्यापन करते रहे। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि प्रो.राय ने श्री रजनीश को, जो बाद में "भगवान रजनीश, 'ओशो' " के नाम से सारी दुनिया में मशहूर हुये ,एम.ए. में दर्शनशास्त्र की शिक्षा दी।


1956 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुये। 1964-65 में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उपाचार्य रहे। 1974 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने तथा 1977 में दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुये। 


1965 में अपने शोधकार्य को "The Heritage of Sankara" नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। 1972 में उनके उत्कृष्ट शोध के आधार पर कानपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। अपने उच्च कोटि के शोधपत्रों के कारण एक दर्शनशास्त्री के रूप में वे अत्यंत प्रसिद्ध हुये। उनके कुछ शोधपत्र आज भी प्रासंगिक एवं प्रामाणिक माने जाते हैं- "Philosophy and Physics"; "Pramana- A study in Indian Criteriology"; "The vision of Immediacy in Bradley's Philosophy"; "Buddhism and Vedanta Anvikshikt"; "Philosophical Direction of Indian Culture"; "Towards a Philosophical Inquiry Concerning Definition of Indian Culture".


प्रोफेसर राय ने Edmund Husserl के "दृश्य-घटनाविज्ञान" /"व्यवहारवाद" (Phenomenology ) तथा K.C.Bhattacharya के दर्शन पर गहन अध्ययन किया। दरअसल प्रोफेसर राय अपने दर्शन को "Phenomenological Advaitism" का नाम दिया करते थे। 


विख्यात दर्शनशास्त्री कांत (Kant) के दर्शन पर उन्हें महारत हासिल थी और बड़ी सरल एवं सुगम भाषा में वे कांत के दर्शन की बारीकियों को अपनी कक्षाओं में समझाया करते थे। अपने मान अपमान से ऊपर उठकर वे सदैव छात्रों के हित और कल्याण की चिंता किया करते थे। एक छात्र किसी बात पर प्रो.राय से बेहद नाराज हो गया और उन्हें बहुत भला बुरा कहा। संयोग से उस छात्र के एक प्रश्न पत्र की उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन के लिए प्रो.राॅय के पास आ गयी । परीक्षा फल निकलने के बाद वह छात्र प्रोफेसर राॅय के घर आया और रोते हुए उनके पैर छूकर माफी मांगी और कहा कि सर मैं बहुत डरा हुआ था, विभाग में भी लोग कह रहे थे कि आप मुझे फ़ेल कर देंगे लेकिन आपने तो मुझे बहुत ही अच्छे अंक दिये हैं, इस पर प्रोफेसर राय ने कहा कि मैंने यह अंक तुम्हें नहीं उत्तर पुस्तिका में लिखे उत्तरों को दिये हैं।


 प्रोफेसर राय एक सरल, सहज और नेक दिल इंसान थे।उनकी दानशीलता की अनेक कहानियाँ मशहूर हैं- जब कभी वे रिक्शा लेकर अपने लिये कुछ खरीदारी करने कटरा जाते थे तब रिक्शा चालकों में उन्हें अपने रिक्शे पर ले जाने की एक होड़ लगी रहती थी । ऐसा इसलिए कि वे अपने लिये जो भी कपड़े खरीदते थे वही कपड़े उस गरीब रिक्शा चालक के लिए भी खरीद लिया करते थे। 


एक महान दर्शनशास्त्री, आदर्श अध्यापक, मनसा -वाचा-कर्मणा एक सरल एवं सहृदय व्यक्तित्व के धनी, गरीबों के प्रति दयालु, कर्तव्य परायण प्रोफेसर शिव शंकर राय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की गरिमा में चार चाँद लगा दिए ... उन्हें शत-शत नमन करके मुझे स्वयं गर्व की अनुभूति हो रही है। 


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